सिद्धाश्रम क्या था ? और क्यों था विश्वामित्र की यज्ञस्थली ?

 सिद्धाश्रम क्या था ? और क्यों था विश्वामित्र की यज्ञस्थली ? :-----

इस शीर्षक के अन्तर्गत आज मैं आपको सिद्धाश्रम से जुड़े रहस्य ?विश्वामित्र के द्वारा अपने यज्ञ के लिए इसी स्थल का चुनाव ? तथा राम को विश्वामित्र द्वारा दी गई विद्याओं के प्रयोग संबधी जानकारी प्रस्तुत करूंगीं पिछले ब्लॉग में मैने राम को विश्वामित्र के द्वारा बला-अतिबला मंत्र समुदाय एवं दिव्यास्त्र प्रदान करने के विषय में चर्चा की थी । मंत्र समुदाय की विशेषता एवं प्रभाव का और अस्त्रों के दिव्य स्वरूप का वर्णन भी किया ।और अब विश्वामित्र द्वारा दिये गये अस्त्रों के राम द्वारा प्रयोग किये जाने संबंधित विषय पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करूंगी । 

विश्वामित्र से राम का सिद्धाश्रम के विषय में पूछना :---

अस्त्रों की उत्पति ,उनकी क्षमताओं एवं विशेषताओं को जानने के पश्चात  राम ने उन्हें ग्रहण किया और आगे की यात्रा आरंभ की , चलते चलते उन्हें एक पर्वत दिखाई दिया और उसके समीप ही एक सघन वृक्षों से आच्छादित वन भी ,मन में आश्चर्य एवं उत्कंठा हुई तो अनायास ही विश्वामित्र से राम ने  इस सघन वन के बारे में पूछा , क्यों कि अभीतक जिस वन में विचरण कर रहे थे वो अत्यन्त रोमांचकारी एवं दुर्गम था । अब जो सामने था वो अत्यन्त दर्शनीय एवं मनोहर प्रतीत हो रहा था । पक्षियों और मृगों से भरा यह वन मनमोहक था । इसे देखते ही राम ने कहा शायद हमलोग उस ताटकावन से बाहर निकल आये हैं । तब विश्वामित्र ने बताया कि यही  सिद्धाश्रम है ।



 विश्वामित्र से राम के प्रश्न :---

1 -- यह आश्रम किसका है ? 

2 -- और इसका नाम सिद्धाश्रम क्यों है ?

3 -- वह स्थान कौन सा है जहां आपकी यज्ञ क्रिया हो रही है ?

4 -- मुझे कहां उन पापी ,दुराचारी ,ब्रह्महत्यारे और दुरात्मा राक्षसों से आपके यज्ञ की रक्षा करनी है तथा उनका वध करना है ?

5 -- आपका आश्रम किस देश में है ?

 हे मुनिश्रेष्ठ मुझे बताइये , यहां ये बात जानना आवश्यक है कि विश्वामित्र ने ताटका वन में प्रवेश करने से पूर्व ही "बला-अतिबला" मंत्र समुदाय की शक्ति से राम को अभिमंत्रित कवच धारण करा दिया था , जिसके कारण ताटका(ताड़का) उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई , अब आगे क्योंकि मारीच तथा सुबाहु से मुठभेड़ होनी थी ? तो ताटका वध के उपरान्त ही उसी ताटका वन में ही विश्वामित्र ने राम को दिव्यास्त्र सहित अनेक शक्तियों से भर दिया , जिनका प्रयोग राम ने इस युद्ध में किया और विजयी हुए। )

विश्वामित्र के उत्तर :----

विश्वामित्र राम की जिज्ञासा देख बहुत प्रसन्न हुए तथा उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए बोले ,

ये सिद्धाश्रम यहीं और यही है,ये पूर्व काल में भगवान विष्णु की तपस्थली था । यहां उन्होंने सौ युगों तक तपस्या के लिये निवास किया (अर्थात वामन अवतार धारण करने के पूर्व से ही ये आश्रम उनका ही था ।)

क्योंकि यहां विष्णु को सिद्धि प्राप्त हुई थी इसलिए ये सिद्धाश्रम के नाम से प्रसिद्ध है ।( फिर विश्वामित्र ने वामन अवतार प्रकरण सुनाया ) 

राम यही वो स्थान है जहां मैने यज्ञ का अनुष्ठान किया है,क्योंकि मेरे आराध्य ने स्वयं यहां तपस्या की थी इसलिए इससे सुखद एवं सिद्ध स्थल मेरे लिये और कोई हो ही नहीं सकता था । 

दुर्भाग्यवश इसी स्थान पर मेरे यज्ञ में विघ्न डालने वाले राक्ष


स आने लगे हैं जिसके कारण मेरे यज्ञ में अनेकों रुकावटें आतीं हैं,इसीलिए तुम्हें यहीं उन दुराचारीयों का वध करना है । बस अब हम सिद्धाश्रम में पहुंचने ही वाले हैं । 

इसके बाद ऋषि ने दोनों भाईयों का हाथ पकड़कर सिद्धाश्रम में प्रवेश किया । सिद्धाश्रम में उपस्थित समस्त ऋषि गण विश्वामित्र की अगुवाई के लिये पहुंच गये , राम लक्ष्मण ने दो घड़ी के विश्राम उपरान्त हाथ जोड़कर विश्वामित्र से कहा -ऋषिवर आप अभी से यज्ञ की दीक्षा ग्रहण करें । तथा यह सिद्धाश्रम आपके लिए यथानाम तथागुण सिद्ध हो ।

तत्पश्चात विश्वामित्र नियमपूर्वक यज्ञ की दीक्षा में प्रविष्ट हुए। वे दोनों राजकुमार भी प्रातः स्नान आदि से निवृत्त हो  संध्योपासना के बाद ऋषि के समीप आये (वाल्मीकी रामायण, बालकाण्ड,अट्ठाइस  एवं उन्तीसवां  सर्ग) 

राम लक्ष्मण का विश्वामित्र से विघ्नकारी राक्षसों के आने का समय पूछना :----

विश्वामित्र के निकट पहुंचकर राम लक्ष्मण ने उनसे उन दोनों राक्षसों के आने का समय जानने की तथा निर्देश प्राप्त करने की चेष्टा की । इस विनम्रता पर उपस्थित ऋषिगण ने राजकुमारों की भूरि भूरि प्रशंसा की और बताया कि ऋषि ने क्योंकि दीक्षा ग्रहण कर ली है इसलिए अब से वे मौन रहेंगे और आप दोनों वीर आज से छः रातों तक इनके यज्ञ की रक्षा करते रहें  ।मुनियों की बात सुनकर राम और लक्ष्मण ने अपलक  छः रात और छः दिन तक उस तपोवन की रक्षा की ।

राक्षसों के आने का संकेत :----

इसप्रकार पांच दिन व्यतीत हो जाने के पश्चात जब छठा दिन आया तब राम ने लक्ष्मण को सावधान होने को कहा जबतक राम ये कह ही रहे थे कि यज्ञ वेदी सहसा प्रज्वलित हो उठी ,   "वेदी का इसप्रकार जलना राक्षसों के आगमन का सूचक था ।" इसके बाद कुश ,चमस ,स्त्रुक (एक प्रकार की हवन सामग्री ) समिधा और फूलों से सुसज्जित यज्ञवेदी पर हवनीय अग्नि प्रज्वलित हुई ( यह प्रज्वलन यज्ञ के उद्येश्य से हुआ ) ।

इधर शास्त्रीय विधि  अनुसार वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ यज्ञ कार्य आरंभ हुआ। कि ठीक उसी समय आकाश में बड़े जोर के भयानक शब्द सुनाई दिये तथा लगता था संपूर्ण आकाश घेरे हुये मारीच और सुबाहु अपने अनुचरों के साथ यज्ञ मंडप की ओर दौड़े चले आ रहे हैं  ,वहां आते आते उन राक्षसों ने अपने पुराने अंदाज़ में रक्त मांस की बरसात प्रारम्भ कर दी ,जिससे यज्ञवेदी के आसपास की ज़मीन गीली हो गई। 

राम का विश्वामित्र द्वारा दिये अस्त्रों का प्रयोग करना :-----

इस तरह रक्त मांस की बरसात देख राम ने लक्ष्मण से कहा - देखो वो रहे राक्षस तथा उन्हें आकाश में स्थित देखा  तो सर्वप्रथम मारीच पर लक्ष्य साधते हुए राम ने कहा कि इन कायरों को मैं मारना नहीं चाहता इसी कथन के साथ राम ने "शीतेषु नामक मानवास्त्र " ( जिसे विश्वामित्र ने ताटका वन में राम को प्रदान किया था) का संधान मारीच की छाती में किया  जिसके प्रहार से मारीच सौ योजन की दूरी पर समुद्र के जल में जा गिरा । फिर राम ने लक्ष्मण को इसकी विशेषता बताते हुए कहा कि देखो लक्ष्मण,यह अस्त्र इस राक्षस को मूर्छित करके दूर लिये जा रहा है पर प्राण नहीं ले रहा ? क्योंकि यह राजा मनु का शीतेषु मानवास्त्र है । तो अपने नामानुसार कार्य में प्रवृत्त है ।


फिर हाथ की फुर्ती दिखाते हुए राम ने अग्नि देव का प्रिय अस्त्र "आग्नेयास्त्र" सुबाहु की छाती पर चलाया जिसकी चोट से वह मरकर पृथ्वी पर गिर पड़ा ।

तत्पश्चात "वायव्यास्त्र" से उनके समस्त अनुचर राक्षसों का भी संहार राम ने कर डाला । (वाल्मीकी रामायण बालकाण्ड, तीसवां सर्ग)

मतलब दो राक्षस और उनकी विशाल सेना को(जिन राक्षसों का नाम सुनकर राजा दशरथ भी कांप गये थे) राम ने विश्वामित्र द्वारा दिये गये सिर्फ तीन अस्त्रों ( मनु का शीतेषु मानवास्त्र,अग्नि काआग्नेयास्त्र  और वायु का वायव्यास्त्र) के प्रयोग से राक्षस सेना को ध्वस्त कर डाला  । 

ये थे विश्वामित्र जिन्होंने अपने तपोबल से अर्जित कीं समस्त विद्यायें राम को केवल लोक-कल्याण के लिये यूं ही सोंप दीं तभी तो राम ने मारीच पर उस अस्त्र का प्रयोग किया जिससे उसे हटा भी दिया जाये और बचा भी लिया जाये ।

 क्योंकि स्वयं ब्रह्म होने के नाते उन्हें पता था कि रावण वध के प्रथम कारणों में से ये मारीच ही दूसरा कारण बनेगा इसलिये उसे बचा लिया ( "राम कथा और भ्रान्तियां" में मैने इस विषय पर प्रकाश डाला है )क्योंकि इस क्रम में पहला कारण सूर्पणखा थी । जिसने रावण को राम से युद्ध करने के लिए प्रेरित किया ।

इसप्रकार विश्वामित्र ने अपने यज्ञ की रक्षा करवाने से पूर्व ही राम को मंत्र समुदाय धारण करा तथा दिव्यास्त्रों को समर्पित कर उन्हें सक्षम बनाया तदुपरांत यज्ञ की रक्षा का आदेश दिया जिसके प्रताप से विश्वामित्र का यज्ञ अनुष्ठान शान्तिपूर्वक सम्पन्न हो पाया । इसके बाद की कथा मैने अपने ब्लॉग (राम कथा और भ्रान्तियां) में दी है । 

  अर्थात राम को प्रसिद्धी दिलाने एवं राम को सर्वश्रेष्ठ बनाने में विश्वामित्र का अद्वितीय योगदान था । आगे उन्होंने  राम से कुछ सत्कर्म कराये जैसे अहिल्या उद्धार (जिसे मेेेेरे ब्लॉग "राम कथा और भ्रान्तियां"में विस्तार सेेे बताया है  सीता का वरण करने के लिये शिव धनुष उठाने की आज्ञा भी विश्वामित्र ने ही दी , क्यूंकि यदि विश्वामित्र नहीं कहते ? तो ये कार्य पूर्ण हो ही नहीं हो पाता ( भौतिक दृष्टिकोण से)  

इन सबके अलावा का एक और पहलू था वो था उनका अपनी बहन से जुड़ाव जिसे उन्होंने राम से व्यक्त किया था उनकी बहन सत्यवती जो सशरीर ही स्वर्ग गईं थीं फिर वे कौशिकी नदी के रूप में जनकल्याण हेतु पुनः प्रकट हुईं ।विश्वामित्र ने बताया कि जब भी अब (ब्रह्मर्षि बनने के बाद)वे कोई सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं तो इसी कौशिकी नदी (बहन) के तट पर ही अपना अनुष्ठान पूर्ण करते है जिससे उन्हें बहुत सुख का अनुभव होता है , यही नहीं यदि वे कभी बैचैनी का अनुभव करते हैं तब भी महीनों, सालों तक अपनी बहन के पास ही निवास कर स्वयं को शान्त करते हैं । 

यहां मैं विश्वामित्र के इतिहास को विराम देती हूं अभी तक विश्वामित्र के जीवन पर मैंने जितने भी ब्लॉग लिखे हैं उनके माध्यम से प्रकृति,दैवीय,ईश्वरीय एवं यौगिक रहस्यों पर से बहुत हद तक पर्दा उठाया है आगे भी ऐसी सामग्री पठन पाठन हेतु उपलब्ध कराने का प्रयास करती ही रहूंगी कि जिससे मन में उठे प्रश्नों को समाधान मिल सके एवं हम अपने सनातन धर्म को वैज्ञानिक आधार पर स्वयम तौल सकें । क्योंकि सृष्टि की रचना से लेकर महालय तक तथा पुनः सृष्टि के प्रादुर्भाव का कारण आध्यात्मिक ही नहीं अपितु सौ प्रतिशत वैज्ञानिक भी है,बस देखने और समझने की जिज्ञासा चाहिए। 

अब आगामी ब्लॉग में मैं कर्म सिद्धान्त के विषय में चर्चा करूंगी तथा ईश्वरीय नियम इस पर कैसे कार्य करता है ? जैसे रहस्यों को खोलूंगी, वो भी प्रमाण के साथ । बस आप मेरे ब्लॉग को सब्सक्राइब करें तथा शेयर और कमेंट करें ।

धन्यवाद 

राधे राधे 





































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